जब तुड़वा दिया गया था कुकरू का बखान करती कविता का पत्थर

उठने लगी मांग: कुकरू के विकास के साथ ही कविता भी मूल स्थान पर की जाएं प्रतिष्ठित



●उत्तम मालवीय (9425003881)●
बैतूल। जिले के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कुकरू के हिल स्टेशन के रूप में विकास को बन रही योजना के बीच कुकरू से जुड़े कुछ किस्से और घटनाक्रम भी ताजा होने लगे हैं। इन्हीं में से एक है कुकरू में रेस्ट हाउस के ठीक सामने लगी कुकरू के प्राकृतिक सौंदर्य और महत्व को बयां करती राष्ट्रीय कवि मदन मोहन समर द्वारा रचित कविता का पत्थर एक वन अधिकारी द्वारा तुड़वा देना और फिर विरोध होने पर पीछे की ओर एक कोने में बगैर नाम के लगवा देना, जिससे किसी की नजर ही उस पर ना पड़े। अब यह मांग भी जोर पकड़ रही है कि कुकरू का विकास होने के साथ ही इस कविता लिखे पत्थर को भी उसके नाम सहित मूल स्थान पर प्रतिष्ठित किया जाएं।
डीएसपी और वर्तमान में पुलिस अकादमी भोपाल में पदस्थ मदन मोहन समर जिले में लंबे समय तक पदस्थ रहे हैं। वे वर्ष 2005 में भैंसदेही थाना प्रभारी थे। उसी बीच कुकरू में चित्रकारों का एक कैम्प लगा था। तत्कालीन डीएफओ अन्ना गिरी के आग्रह पर कैम्प फायर में समर भी शामिल हुए थे। इसमें समर ने कुकरू के सौंदर्य का बखान करती एक कविता सुनाई, जो उन्होंने वहीं सनसेट पॉइंट पर बैठकर लिखी थी। यह कविता डीएफओ श्री गिरी को इतनी पसंद आई कि उन्होंने इस कविता को छिंदवाड़ा से एक ग्रेनाइट के पत्थर पर लिखवा कर बुलवाई, इस पर समर का नाम और मोबाइल नम्बर भी लिखा गया। इस पत्थर को उन्होंने रेस्ट हाउस के ठीक सामने आकर्षक तरीके से डेकोरेट करके लगवाई। इससे यहाँ आने वाले हर व्यक्ति की नजर इस पर पड़ती थी और लोग इसकी फ़ोटो लेकर जाते थे और कुकरू के बारे में कविता से जानकारी भी हासिल करते थे। वर्ष 2008 में समर का सागर ट्रांसफर हो गया। इसी बीच पूना के एक बड़े उद्योगपति विजय कुमार कुकरू आए। उन्होंने यह कविता देखी तो उन्हें यह बड़ी पसंद आई। उन्होंने समर से सम्पर्क कर अनुमति ली और इस कविता की 5000 सीनरी बनवाकर अपने कर्मचारियों और मित्रों को दीवाली के उपहार के रूप में भेंट की। इससे दूर-दूर तक कुकरू और इस कविता की ख्याति पहुंची।
इन्हें फूटी आंख नहीं सुहाई वह कविता
इस बीच डीएफओ पंकज अग्रवाल साउथ डिवीजन में पदस्थ हुए। वे कुकरू पहुंचे तो उनको वहाँ लगी यह कविता फूटी आंख नहीं सुहाई। इसके चलते उन्होंने यह पत्थर ही तुड़वा दिया और वहाँ से हटाकर पीछे की ओर रखवा दिया। इस दौरान पत्थर पर लिखा समर का नाम भी टूट गया। इसके बाद जब भैंसदेही के कुछ लोग कुकरू पहुंचे तो यह नजारा देख उन्हें बड़ा नागवार गुजरा। उन्होंने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि आपकी व्यक्तिगत किसी से अनबन हो सकती है पर कुकरू के सौंदर्य को बयां करती कविता से बैर क्यों।
साहित्यकारों की मांग- मूल स्थान पर ही लगे
लोगों का विरोध देखने के बाद दबाव में डीएफओ अग्रवाल ने वर्ष 2009 में कविता का वह पत्थर तो लगवा दिया, लेकिन पहले वाले स्थान पर नहीं लगाया गया बल्कि पीछे की ओर एक कोने में लगाया गया। इससे सीधे तौर पर उस पर किसी की नजर नहीं पड़ती बल्कि विशेष रूप से उसे देखने जाने पर ही पत्थर दिख पाता है। इससे अधिकांश लोगों को उस बारे में पता ही नहीं चल पाता। इसके अलावा अब पत्थर पर समर का नाम भी नहीं है। इससे नाखुश साहित्यकारों और सृजनधर्मियों की मांग है कि वह पत्थर पूर्ववत मूल स्थान पर ही होना चाहिए और उस पर लेखक का नाम भी ससम्मान लिखा होना चाहिए।
मेरा नहीं, कुकरू और कविता का अपमान: समर
इस संबंध में डीएसपी मदन मोहन समर ने ‘बैतूल अपडेट’ से चर्चा में कहा कि पत्थर को हटाने से मेरा कोई अपमान नहीं हुआ, लेकिन कविता और कुकरू के सौंदर्य व महिमा का अपमान हुआ है। उस कविता से किसी का ईगो हर्ट नहीं होना चाहिए। हमारी यही मांग है कि कुकरू के महत्व को रेखांकित करती वह कविता उसके मूल स्थान पर पुनः सम्मान के साथ लगना चाहिए और वह भी लेखक के नाम सहित, क्योंकि बिना लेखक के कविता का कोई उद्देश्य या महत्व नहीं होता है।
—-यह है वह कविता—-
कुकरू

अप्रतिम अनुपम छटा
बैठ कुकरू के परों पर
हाथ से छू लो घटा।

दूर तक,
हाँ! दूर तक
नयनसुख, मन की उड़ानें
घाटियों में बादलों की
टोलियां आकर बुलातीं।
धुंध कजरारी नमी भर
नृत्य करती झूमती सी
सांझ की अल्हड़ पवन
टहलती है गुनगुनाती।
गंभीर मंथन के लिये ज्यों
व्योम धरती से सटा।

धूप निकली तो सुनहरी
छाँव चित्रों सी रुपहली
बोलकर कुछ कह रही सी
रात भी लगती पहेली
रात-दिन, दिन-रात संधि
का समय वरदान सा है
दोपहरी भी जहाँ पर
यूं लगे ज्यों हो सहेली।
चाँदनी तो रेंगती है
खोलकर पूरी लटा।

सतपुड़ा में धूपगढ़ की
लाड़ली सी है बहन
चिर किशोरी यौवना सी
उच्छृंखल या गहन
अभिसार मादक मस्त से
सम्मोहनों के अस्त्र से
फेंकती है मुस्कुराहट
वस्त्र ऋतुओं के पहन।
परिणिता नव, आ के पीहर
ज्यों खड़ी घूँघट हटा।

वेणिंयों से गुंथी है
शृंग-शैली शृंखला यह
शृंगार सोलह से सजी सी
खामला की मेखला यह।
भोंडिया, लोकलदरी में
है महक ऐसी घुली।
खाइयों ने, खंदकों ने
इत्र जैसे हो मला यह।
रोक लो… हाँ रोक लो मन
यह चला फिर वो चला।
ले गये कितने नयन
रूप फिर भी न घटा।

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