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हरसिद्धि माता शक्तिपीठ: यहां हर 12 साल में अपना शीश अर्पित करते थे सम्राट विक्रमादित्य, 1101 दीपों से जगमग होता है यह सिद्ध स्थल

• लोकेश वर्मा, मलकापुर
बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में माता के 51 शक्तिपीठों में से एक हरसिद्धि माता मन्दिर स्थित है। मान्यता अनुसार इस स्थान पर देवी सती की कोहनी गिरी थी। यूं तो इसकी और भी कई विशेषताएं हैं, लेकिन एक खास बात जो लोगों के आकर्षण का केंद्र है वो है मंदिर प्रांगण में स्थापित 2 दीप स्तंभ। ये दीप स्तंभ लगभग 51 फीट ऊंचे हैं। दोनों दीप स्तंभों में मिलाकर लगभग 1101 दीपक हैं। जिन्हें संध्याकाल की आरती के समय प्रतिदिन चार सेवादारों द्वारा एक साथ जलाया जाता है।

मान्यता है कि इन दीप स्तंभों की स्थापना उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने करवाई थी। विक्रमादित्य का इतिहास करीब 2 हजार साल पुराना है। इस दृष्टिकोण से ये दीप स्तंभ लगभग 2 हजार साल से अधिक पुराने हैं। 51 फीट ऊंचे दोनों दीप स्तंभों को एक बार जलाने में लगभग 4 किलो रूई की बाती व 60 लीटर तेल लगता है।

उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य हैं माता हरसिद्धि। वे माता के परम भक्त थे। किंवदंती है कि हर बारह साल में एक बार वे अपना सिर माता के चरणों में अर्पित कर देते थे। लेकिन माता की कृपा से पुन: नया सिर मिल जाता था। बारहवीं बार जब उन्होंने अपना सिर चढ़ाया तो वह फिर वापस नहीं आया। इस कारण उनका जीवन समाप्त हो गया।

उज्जैन के प्राचीन और पवित्र स्थानों में हरसिद्धि देवी का मंदिर विशेष महत्व रखता है। यह देवी सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य देवी मानी जाती है। स्कंध पुराण के अनुसार प्राचीन काल में दो असुर थे – चंड और प्रचंड। उन्होंने अपने प्रबल पराक्रम का आतंक सारी पृथ्वी पर फैलाया हुआ था।

उन्होंने अपना बल कैलाश पर भी आजमाया। यह देख भगवान शिव ने चंडी का स्मरण किया। देवी के प्रकट होने पर शिवजी ने दानव का वध करने का आदेश दिया। चंडी देवी द्वारा दानव का वध करने पर भगवान शिव ने आशीर्वाद दिया कि जगत में तुम्हारा नाम हरसिद्धि प्रसिद्ध होगा।

उज्जैन यात्रा में इनका दर्शन अत्यंत पवित्र होता है। शिव पुराण के अनुसार यह सती की कोहनी का स्थान है। उज्जैन के मंदिरों में हरसिद्धि माता प्रमुख है। महासरस्वती तथा महालक्ष्मी की प्रतिमाओं के मध्य हरसिद्धि माता की मूर्ति शोभायमान है। इस मंदिर के नीचे महाकाली की मूर्ति है तथा कुछ आगे दाएं-बाएं काल भैरव की मूर्ति विराजमान है।

अंतः ग्रंथों के अनुसार इसे शक्ति पीठ एवं सिद्ध पीठ कहा गया है। विक्रमादित्य ने तपस्या कर उनका दर्शन किया था। 11 बार अपना सिर इन्हें अर्पित किया और 11 बार सिर्फ उनके शरीर से जुड़ गया।आज भी मंदिर में विक्रमादित्य का सर रखा हुआ है, ऐसा माना जाता है। शिव पुराण के अनुसार अपनी पत्नी सती की जलती पार्थिव देह दक्ष प्रजापति की यज्ञ वेदी से उठा कर ला रहे थे। तब इस स्थान पर उनकी कोहनी गिरी थी। यह स्थान तंत्र सिद्धि हेतु उपयुक्त है।

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हरसिद्धि देवी की प्रतिमा दिव्य चांदी मुकुट, लाल रंगों से अलंकृत है। मां हरसिद्धि देवी के पीछे अन्नपूर्णा देवी जी हैं। दाएं-बाएं हाथ पर शिव जी का चित्र है। द्वार पर पीतल का पत्तर चढ़ा हुआ है। मां का दरबार अति अलंकृत, अनेक रंगों के शीशे से जड़ित, संगमरमर पत्थर से सुसज्जित है।

मंदिर द्वार से एक गोल गुंबद बना बरामदा है। यहां सभी देवी-देवताओं की पत्थर की मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर प्रांगण में एक विशाल बरामदा बना हुआ है तथा एक पीपल का वृक्ष लगा हुआ है। मां हरसिद्धि के आसपास लक्ष्मी और सरस्वती देवी विराजमान है।

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मध्य में श्री यंत्र प्रतिष्ठित है। यही देवी मां हरसिद्धि है। श्रीयंत्र पर ही देवी मां की सूरत गढ़ी गई है जिन्हें सिंदूर चढ़ाया जाता है। नवरात्र आदि पर्व पर स्वर्ण रजत मुकुट पहनाया जाता है। नित्य देवों के नौ श्रंगार होते हैं। भक्त प्रातः और सायं कालीन आरती के समय दर्शन कर आनंदित हो जाते हैं। हरसिद्धि मां की वेदी के नीचे की ओर भगवती भद्रकाली और भैरव की प्रतिमा है। जिन्हें सिंदूर नहीं चढ़ाया जाता है।

श्री मंदिर में पीठेश्वरी मां हरसिद्धि के अतिरिक्त महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती तीनों विराजित हैं। मंदिर के दाएं ओर स्थित चित्रशाला में विक्रमादित्य और उनकी राज्यसभा के नौ रत्नों धनवंतरी, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, बेताल भट्ट, घटकर्पर, कालिदास, वराहमिहीर तथा वररुचिक के सुंदर चित्र लगे हुए हैं। इसी प्रकार श्री मंदिर के सभा मंडप में नौ देवियों के चित्रों का बहुत ही खूबी के साथ चित्रित किया गया है।

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मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते ही मां के वाहन सिंह के दर्शन होते हैं। प्रवेश द्वार के दाई ओर दो बड़े नगाड़े रखे हुए हैं जो आरती के समय बजाए जाते हैं। माता हरसिद्धि सकल सिद्धि की दात्री है। शुद्ध मन और भक्ति भावना से की गई प्रार्थना मां अवश्य स्वीकार करती है। भक्तजन उनका नाम स्मरण करते हैं। जिससे जीवन का मार्ग सुगम बन जाता है।

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अश्वनी और चैत्र मास की नवरात्रि में यहां नौ दिन तक उत्सव होते हैं। देवी भागवत में वर्णित 51 शक्तिपीठों में से 26 वां यह स्थान है। यहां की भैरवी ‘ मंगल चंडिका’ तथा भैरव ‘मांगल्य कपिलांबर’ है। मंदिर का क्षेत्रफल लगभग एक हज़ार मीटर है। यहां पर प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख भक्त दर्शन करने आते हैं।

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उत्तम मालवीय

मैं इस न्यूज वेबसाइट का ऑनर और एडिटर हूं। वर्ष 2001 से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। सागर यूनिवर्सिटी से एमजेसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री प्राप्त की है। नवभारत भोपाल से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद दैनिक जागरण भोपाल, राज एक्सप्रेस भोपाल, नईदुनिया और जागरण समूह के समाचार पत्र 'नवदुनिया' भोपाल में वर्षों तक सेवाएं दी। अब इस न्यूज वेबसाइट "Betul Update" का संचालन कर रहा हूं। मुझे उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित सरोजिनी नायडू पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य भी नवदुनिया समाचार पत्र में कार्यरत रहते हुए प्राप्त हो चुका है।

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