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महिला जनप्रतिनिधि की जगह पति ने ली बैठक तो पत्नी का जाएगा पद, राजगढ़ कलेक्टर ने दिए कार्यवाही के आदेश, मची खलबली

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मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले के कलेक्टर (Collector of Rajgarh District) के एक आदेश ने इन दिनों खलबली मचा रखी है। यह खलबली खासतौर से उन लोगों में मची है जिन्होंने सीट रिजर्व होने पर पत्नी को चुनाव तो लड़ा दिया, लेकिन सत्ता की बागडोर अपने पास ही रखते हैं। वे न केवल सारा कामकाज देखते हैं बल्कि सरकारी बैठकों तक में खुद शामिल होते हैं। अधिकारियों को आदेश-निर्देश भी देते हैं। राजगढ़ कलेक्टर ने अब ऐसी महिला जनप्रतिनिधियों को सीधे पद से हटाने की कार्यवाही करने के आदेश दिए हैं।

कलेक्टर राजगढ़ ने 2 सितंबर को यह आदेश जारी किया है। यह आदेश मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत राजगढ़, ब्यावरा, नरसिंहगढ़, ब्यावरा, सारंगपुर, खिलचीपुर और जीरापुर को जारी किया गया है। इस आदेश में कहा गया है कि राजगढ़ जिले में त्रिस्तरीय पंचायतों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के उद्देश्य से जिला, जनपद और ग्राम पंचायतों में महिलाओं के लिये 50 प्रतिशत पद आरक्षित किये गये हैं।

त्रि-स्तरीय पंचायतों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास में उन की भूमिका को मजबूत बनाने के उद्देश्य से यह आवश्यक है कि जिला, जनपद की साधारण सभा, ग्राम सभाओं की बैठक व मीटिंग में महिला अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सदस्य, सरपंच, पंच की सक्रिय भागीदारी हो।

महिला आरक्षित पदों पर निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के एवज में जिला, जनपद, ग्राम पंचायत की बैठकों का संचालन उनके पुरूष (पति एवं अन्य परिजनों) द्वारा किया जाना वर्जित है। यदि कोई अध्यक्ष, सदस्य, सरपंच पति या पंच पति महिला निर्वाचित जनप्रतिनिधि के स्थान पर जिला, जनपद, ग्रामसभा की बैठकों में भाग लेता पाया जाता है तो संबंधित महिला अध्यक्ष, सदस्य, सरपंच, पंच के विरूद्ध पद से विधिवत हटाए जाने की कार्यवाही प्रारंभ करें। उपरोक्त निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाएं।

यह पत्र जारी होने के बाद से ही हड़कंप मचा है। गौरतलब है कि आरक्षण की प्रक्रिया के चलते कई बार सीट महिला के लिए आरक्षित हो जाती है। इससे पुरुष चुनाव नहीं लड़ पाते। ऐसे में अपने इलाके में दखल और हुकूमत बनाए रखने कई नेता अपनी पत्नी या अन्य किसी परिजन को चुनाव लड़ा देते हैं। लंबे समय से सक्रियता, अच्छी छवि और पैठ के चलते इनके परिवार की महिला चुनाव जीत भी जाती हैं।

यह बात अलग है कि जीतने के बाद महिलाओं की जिंदगी पहले की तरह घर की चारदीवारी तक सिमट जाती है। वहीं अधिकांश जगह सत्ता की बागडोर उनके पति या अन्य परिजन थाम लेते हैं। वे सारा कामकाज ही नहीं संभालते, बल्कि बैठकें तक लेते हैं। इससे महिला सशक्तिकरण का शासन का मंसूबा भी पूरा नहीं हो पाता है। यही कारण है कि अब शासन भी इस मामले में सख्ती बरत रहा है। हालांकि अभी अन्य जिलों में इस तरह के आदेश जारी नहीं हुए हैं, लेकिन बाकी जगह भी लोग उम्मीद कर रहे हैं कि जल्द ही ऐसे आदेश सभी दूर जारी हो जाएंगे।

उत्तम मालवीय

मैं इस न्यूज वेबसाइट का ऑनर और एडिटर हूं। वर्ष 2001 से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। सागर यूनिवर्सिटी से एमजेसी (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन) की डिग्री प्राप्त की है। नवभारत भोपाल से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद दैनिक जागरण भोपाल, राज एक्सप्रेस भोपाल, नईदुनिया और जागरण समूह के समाचार पत्र 'नवदुनिया' भोपाल में वर्षों तक सेवाएं दी। अब इस न्यूज वेबसाइट "Betul Update" का संचालन कर रहा हूं। मुझे उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए प्रतिष्ठित सरोजिनी नायडू पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य भी नवदुनिया समाचार पत्र में कार्यरत रहते हुए प्राप्त हो चुका है।

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